Monday, 19 August 2019

मुकम्मल

तुम इतने चमकीले क्यूँ हो ?
वो सीने की चमक सताती है मुझे___
अपनेआप को रगड़ लूँ वहीं,
तो मुकम्मल हो जाऊँ___तसल्ली हो मुझे !
पर एक बात बताओ ?
क्या मैं, सच में मुकम्मल हूँ ?

तुम्हें सोचती हूँ तो बेचैनी बढ़ती है,
चादर की सिलवट भी तुम्हारी ओर लाती है !
पल्लू की चुन्नट भी सीधी न होती जब,
तब तुम याद आते हो____
बताओ, क्या मैं मुकम्मल हूँ ?

तुम्हारा पागलपन सिर चढ़कर बोलता है,
कभीकभी अदरक का स्वाद भी फी़का लगता है,
तुमसे करारी चाय न पी अब तक मैंने,
फिर भी तुममें डूबोकर कुछ खाने का मन करता है,
बताओ, क्या मैं मुकम्मल हूँ ?

मेरे खुले बालों में तुम्हारा उलझना,
उलझकर साँसों को महकाना,
पावन करता है मेरे तन को,
जैसे घनी शिवाला में कर्पूर सौंधा__!
बताओ, क्या अब भी मुकम्मल हूँ मैं ?

समझाओ, कुछ तो बताओ मुझे,
कि मुकम्मल होना किसे कहते हैं ?
एक शरीर,
जो तुम में मेरा है ?
या एक ऐसा शरीर,
जो सदियों से सदियों तक मेरा ही मेरा है ?

Shilpa___

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