रात और तुम___महकती मैं !
शांत है आज आसमान___!
बादलों की गूँज नहीं और ना ही दामिनी की दमक !
घोर अँधियारा और हल्की मलय पवन !
अपने मिलन के लिए इतनी सजावट बहुत हुई ना ?
तुमने दी थी ना धानी साडी,
आज वहीं ओढ लूँगी,
क्योंकि धाना रंग तुम्हारी पसंद है___!
आखिर इसे भी खींच तुम ही लपेटोगे पता है मुझे !
ये मुझ पर टिकेगी नहीं,
देखा हँस दिए ना__बेहया कहीं के !
इसलिए कहती हूँ,
"पहनूँगी नहीं फ़कत ओढ़ लूँगी__"
माथे पर बडा-सा लाल कुमकुम,
और गले में तुम्हारे नाम का मंगलसूत्र !
बस ना ! तुम ही कहते हो,
तुम सिंपल और सोबर अच्छी लगती हो !
आज बिल्कुल वैसा होगा, जैसा तुम चाहो !
पता है, जुडा बाँधना ही होगा,
तुम्हारे मोगरे के लिए बावली जो हूँ !
कभी लगता है सारे जेवर पहन लूँ,
"बेला महका___" में रेखा ने पहने थे ना ठीक वैसे !
आधी रात कमसकम मुझ से तो
महके !
खैर ! छोडो__ मुझे नहीं बनना किसी जैसा !
अब तुम सुनो !
गहरे आसमान के नीचे,
सिल्क का पितांबरी कद पहने आओगे ?
बुद्धु कद यानी पितांबर,
जो तपस्वी पहनते है !
अपनी भी ये मिलन तपस्या पूरी होगी अब !
तुम्हारे तपे काले बदन पर ये पीला रंग कम्माल का जँचेगा___!
भोर की एक-एक किरन चढे़गी,
और तब तक तुम भी मेरा धाना रंग लपेट लोगे___!
बेहयाई में डुबे हम___कसकर बँधे आगोश में !
कसम से वो शरमाती सुबह की लाली और महकती मैं !
#Shilpa___
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