अधखुली खिड़की,
और उसके ठीक सामने हो रहा,
हमारी जिस्मानी बारीश का तूफान !
ये तूफान थोडा थम गया तब,
मैंने खुद को सौंप दिया तुम्हारे कंधे पर,
लेकिन अब जरुरत थी,
गर्म सांसों के अलाव की__!
मेरा सिंदूर भी मुझसे हटकर,
तुम्हारे सीने पर जा बैठा,
मेरे माथे पर छोड़ दी फ़कत इक सिंदुरी रेखा___!
बडा खूबसूरत-सा हसीन पल,
संजोए थी मैं अपने अंदर___
मेरे काले मियाँ !
आँख तो तुम्हारी लगी थी,
पर ये उचक्का चाँद,
टेर रहा था मुझे देर रात तक !
उसका वो देखना___उफ्फ् !
शर्म की लाली बिखेर रहा था मुझ पर !
अब मैंने भी आव देखा ना ताव
छेड़ दिया तुम्हारे लबों को,
अपने लंबों की तार से,
पता है क्या हुआ शायर ?
राग भूप का मधुर स्वर,
इस मिठास से उत्पन्न हुआ कि,
चाँद भी सुनकर अपनी चाँदनी तक खींचा चला गया___
कयामत कर दी इस जिस्मानी बारीश ने !
#Shilpa
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