तुम्हें आने में देर होती है,
कमबख्त तभी ये शुरु होती है !
आओ तो बता दूँ तुम्हें,
ये फिक्र बडी अटपटी होती है !
आँखें टकटकाया करती है,
मेरी धड़कने बढाती है !
ये बदमाश, लफंगी,
तुम बिन बहुत सताती है !
क्या-क्या करवाती है मुझसे जालिम,
जुडे़ का फेरा भी खुलवाती है !
इन घनी जुल्फों के अँधियारे में,
उलझन और गहरी करती है !
सजती-सँवरती हूँ तुम्हारे लिए,
सारे पर पानी फिरा देती है !
और इक बात पर तुम गौर करो उसकी,
जब तुम आओ देर से,
तो अपना नाम फिक्र बतलाती है !
गर मुझे देर हो तुमसे मिलने,
तो तुरंत शक में पलटती है !
ये ऐसी अजीब फिक्र है जाना,
जो मासा-मासा बदलती है !
सच है शायर,
ये तुम्हारी फिक्र मुझे बडी अटपटी लगती है !
#Shilpa___
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